मंज़िल कोई भी हो, इरादे मजबूत होने चाहिए,रास्ते भले मुश्किल हों, पर कदम बेखौफ होने चाहिए।कुछ ऐसा ही था मेरा यह सफर,जो अंधेरों से शुरू हुआ, पर रौशनी में खत्म हुआ। पिछले कुछ महीने मुश्किल भरे थे,दिल टूटा, उम्मीद भी खो गई थी कहीं।पर इस ट्रिप का ख्याल…एक ray of hope बनकर हमेशा साथ था। फिर जब दिन आया, तो जैसे पूरी कायनात ने रुकावटें डाल दीं,Wrong terminal, canceled flight, bad weather...दिल ने कहा, "Let it go..."पर एक छोटी सी खबर आई— "Sun is out at the airport."और बस वही, वो one sign था,जो कह रहा था, "Don't give up!" और फिर... वो लम्हा आया,जहाँ पहली बार बर्फीली वादियों ने मुझे अपनी बाहों में समाया।खिड़की से बाहर देखा, सफेद चादर ओढ़े पहाड़,जैसे खुदा ने अपनी सबसे खूबसूरत तसवीर उतारी हो यार!

कश्मीर... तू सिर्फ़ एक जगह नहीं,तू सुकून की परिभाषा है।जहाँ दिल के सारे सवाल खामोश हो जाते हैं,जहाँ हर सांस हल्की और हर लम्हा खास हो जाता है।

बर्फ गिरी, हमने उसे अपनी हथेलियों में पकड़ा,बर्फबारी में ट्रेनिंग की, वो ठंड का हर कतरा भी प्यारा लगा।दोस्त बने, तस्वीरें खींची,बर्फ के फरिश्ते बनाए और बेफिक्र हँसी! वो 14 दिन…ना कोई डेडलाइन, ना कोई उलझी हुई कहानी,बस मैं, बर्फीले पहाड़, और एक नयी ज़िंदगानी। अब जब लौट के देखता हूँ,तो समझ आता है—कभी-कभी उम्मीद की सिर्फ़ एक किरण ही काफ़ी होती है,एक सफर ही काफ़ी होता है,ज़िंदगी को फिर से जीना सिखाने के लिए।